तेजस्वीता + तपस्वीता + तत्परता = पुष्टि युवा. _________गो.हरिराय..

Tuesday, March 9, 2010

'' सुखस्य मूलं धर्मः ''

मानव सुख की तलाश में इधर-उधर भटक रहा है, लेकिन वह अपने मन में झांक कर नहीं देखता। जबकि मनुष्य के मन में ही सुख का सागर होता है।भ्रमित मानव भौतिक सुख पाने के लिए सांसारिक वस्तुओं के पीछे तो अंधा होकर भाग रहा है और आध्यात्मिक सुख से विमुख होता जा रहा है जो कि उसके दुख का असल कारण है। संसार में जिस मानव के पास सभी सुख सुविधाएं है वह भी सुखी नहीं है। सुख केवल भगवान के शरणागत होने पर ही मिलता है। आत्मिक शांति सुविधाओं से नहीं बल्कि प्रभु चरणों में मन लगाने से मिलती है।

Sunday, March 7, 2010

अति के प्रति सदा सावधान........

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का निरीक्षण करना चाहिए और अति के प्रति सदा सावधान रखना चाहिए। जो अतिवादी होते हैं वे अपनी भूख, नींद आदि को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं।इच्छाओं को नियमित करने से स्वास्थ्य को ठीक रखने में सहायता मिलती है तथा जीवन प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलने लगता है। इस नियमन या अनुशासन का आशय इच्छाओं का दमन नहीं है, बल्कि इसका अर्थ अपनी क्षमताओं के अनुसार संतुलन स्थापित करना है। बहुत अधिक खाना, सोना, जागना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसा करने से शरीर की विभिन्न प्रणालियों को क्षति पहुंचती है तथा जीवन का उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। इससे मस्तिष्क क्षीण होता है, हीनभावना उत्पन्न होती है तथा आत्मविश्वास का ह्रास होता है। क्रोध दूसरा नकारात्मक संवेग है जो चार मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न होता है। जब किसी इच्छा की पूर्ति नहीं होती है तो उससे मन व्यग्र या उद्विग्न होता है तथा उससे क्रोध का जन्म होता है। इसलिए व्यक्ति के लिए यह शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक है कि क्रोध को कैसे नियंत्रित किया जाये।
ऐसा करना संभव है यदि व्यक्ति यह जान ले कि इच्छाओं को कैसे नियंत्रित किया जाये। व्यक्ति को यह पहले निश्चित कर लेना चाहिए कि कौन सी इच्छाएं उसके विकास में सहायक हैं तथा कौन इच्छाएं उसके विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं। यदि बुद्धि को अनुशासित करना सीख लिया जाये तो इस कार्य में अवश्य सहायता मिलेगी। किसी व्यक्ति ने यदि यह योग्यता अपने में विकसित कर ली है तो क्रोधित होने के बाद वह स्वयं विश्लेषण करेगा कि वह क्यों क्रोधित हुआ तथा उसकी कौन सी इच्छाओं की पूर्ति नहीं हुई। ऐसा करके वह अपने क्रोध के मूल कारण को समझ सकेगा।

Tuesday, December 29, 2009

पुरुषार्थी है वही संसार में उन्नति करता है...


संसार में भाग्य के भरोसे बैठने वाले व्यक्ति ज्यादा है। जबकि भगवान ने सबको कर्म करने का अधिकार दिया है। अच्छे कर्म कर हमें अपने जीवन को सुधारने की दिशा में कदम बढाना चाहिए। यदि हम यूं ही जीवन भर रोते रहेंगे तो सफल नहीं हो पाएंगे। जिस व्यक्ति के अंदर उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम विराजमान है। उस व्यक्ति का भाग्य भी फलित होता है और उसे दैविक शक्तियों का सहारा आशीर्वाद के रूप में मिलता है। जो व्यक्ति पुरुषार्थी है वही संसार में उन्नति करता है और वही सफल होता है। आलस्य और प्रमाद से किसी की उन्नति नहीं होती न ही वहां भाग्य फलता है। भाग्य वही फलता है जहां उद्यमी पुरुष होते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि आज बेईमान और छली-प्रपंची लोग ज्यादा फल-फूल रहे हैं और ईमानदार वहीं का वहीं है। लेकिन वे लोग कभी यह देखने की कोशिश नहीं करते कि बेईमान अपनी बेईमानी के बल पर ही उन्नति नहीं कर रहा है बल्कि वह उसके लिए पुरुषार्थ करता है। जबकि एक ईमानदार व्यक्ति केवल अपनी ईमानदारी के गुण को लेकर बैठा है और पुरुषार्थ नही करता है। यानी वह आलसी है इसलिए उसकी उन्नति रुकी हुई है। आज अगर दुनिया में किसी चीज की कमी है तो वह है मेहनती लोगों की। आज के दौर में हर इंसान कामचोर बनता जा रहा है। जबकि विपरीत हालातों में भी अगर आप हिम्मत करके खडे हैं और पुरुषार्थ करने के लिए तत्पर हैं तो सफलता निश्चित ही प्राप्त कर सकते हैं। इन हालात में भाग्य भी आपका साथ देगा और परमात्मा का आशीर्वाद भी प्राप्त होगा। जहां पर सभी आलसी व भाग्यवादी हो जाते हैं वहां कलह, द्वंद,क्लेश व अशांति का साम्राज्य होता है। इसके विपरीत जहां पर पुरुषार्थी होते हैं वहां भाग्य फलता है और वहीं उन्नति होती है। समस्त दैविक शक्तियां भी उसी की सहायता करती है। इसके लिए मनुष्य को केवल अपने अंदर की शक्तियां को पहचानने व उन्हें जाग्रत करने की आवश्यकता है।