तेजस्वीता + तपस्वीता + तत्परता = पुष्टि युवा. _________गो.हरिराय..

Friday, May 8, 2009

Satisfaction" सन्तुष्टं सततं योगी "

मनुष्य को संतोष से जो सुख मिलता है वह सबसे उत्तम है और उसी सुख को मोक्ष सुख कहते हैं। इसीलिए जीवन में संतोष को परम सुख का साधन कहा जाता है। धन ऐश्वर्य आदि भोग सामग्री की स्वलप्तामें ईश्वर संसार प्रारब्ध पर किसी प्रकार से इसी गिला व रोष प्रकट न करना और अधिकता में हर्ष न करना संतोष सुख कहलाता है। वाचालताका त्याग, निंद्राव कटुवचन सुनने पर, हानि होने पर, क्रोध आदि से आवेश में न आकर, दुर्वचनोंका त्याग, स्वल्प भाषा, विवाद त्याग और यथा शक्ति मौन धारण बातचीत संतोष कहलाता है। शरीर से निन्दित व बुरे कर्म न कराना ही श्रेष्ठ है। संतोष रूपी अमृत से जो मनुष्य तृप्त हो जाता है, उसे महापुरुषों के समान सुख मिलता है। धन ऐश्वर्य के लोभ करने वाले व इधर-उधर भागने वाले मनुष्य को कभी भी संतोष नहीं मिलता। ऐसे व्यक्ति के मन में सदैव बेचैनी रहती है तथा वह लोभ, मोह आदि व्यसनों में पडकर दुखी रहता है। साथ ही जो मानव बुरे कर्म व निंदनीय कार्य करता है वह भी भय के कारण दुख का भागी बनता है। जबकि मन में संतोष होने पर मनुष्य व्यर्थ की लालसा में नहीं पडता है। जिससे वह व्यर्थ की चिंताओं से मुक्त हो जाता है। संतोष धन को इसीलिए सबसे बडा धन कहा गया है। संतोष रूपी सुख पाने के बाद मनुष्य की इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं और वह परमात्मा के करीब पहुंच जाता है जिससे मनुष्य स्वयं सुख को छोडकर दूसरे प्राणियों के सुख-दु:ख के बारे में सोचता है। संतोष से जो सुख मिलता है मनुष्य के लिए उससे उत्तम और मोक्ष देने वाला कोई अन्य परम सुख नहीं होता है।
Go.Hariray.....

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